Friday, September 20, 2013

शनिवारीय दलान - राष्ट्रकविक संग मिथीलाक गपसफ


राष्ट्रकवि माधव घिमिरे कहैछथ - हम मैथलीके प्रसंशक छि ।
नवीन झा

अप्पन देशक मिथिला क्षेत्रमे भिन्न प्रकारक साहित्य संस्कृति छै । अपने एकरा कोना देखैत छियई?
ः हँ, मिथिला प्रदेश बहुतो बात सं समृद्ध अछि । जाहि मे पहिल नम्बर  मैथली भाषा गितके भाषा अछि । ताहिं कारणे ओत मैथिल कोकिल विद्यापतिक जन्मस्थल ओहुना समृद्ध बनोने अछि । एतबे कहा, गाउंगाउंके महिला सब साहित्यक भाषा मे गित गबैंत छैथ, ह कि नई ?
त हम कि बुझैछि छियैक जे हमरा त लागैय जे मैथिलवासी सभ झगडा सेहो गित गबैत करैत छथ । नेपाली भाषा सेहो गितेके भाषा अछि मुदा मैथली भाषा गितक भाषा अछि ।  दोसर यी मिथिला एकटा सांस्कृतिक स्थल अछि । वर्तमान नहिं अतित उपनिषेधकालसं जनक, जिनकर बहुतो परम्परा रहल अछि । जनक सभक परम्परा जाहिंमे सीताक जन्म भेल आ दुगोट महाकाव्य सं हमरा सभक जीवनके अत्याधिक प्रभाव परल अछि । एकटा रामायण आ दोसर महाभारत ।
रामायणक मूल जनक तयार केलैन । हमरा सभके बेटी देलैन । हिन्दूस्तानक व्यक्तिसभ निक घर बसाब नहिं सकलैथ । झगडा भेलै । हम आइए मात्र एकटा पत्रिका पढलौ रामदेव सीताक नैंहर के हम बहुत प्रेम करैत छि से कहलैन । अइके मतलब भारतवर्षक व्यक्तिसभ सेहो अइ संस्कृतिके सम्मान करैत छैथ । यी संस्कृतिक स्थल अछि वर्तमान युगमे मिथिला कलाक प्रचार एहए भेल अछि ।
मिथिलाकला विश्व के नेपाली कला रहल अछि । एकर हरेक बात अलग थलग अछि । एकर  रंगक संयोजन भिन्न अछि । यी  संस्कृति मे कोनाक समाहित अछि, ताय त  दिपावलीमे  लक्ष्मी पुजा करए परल । बहरिया द्वारसं लक्ष्मीक डेगके निशान बनबैत अछि । यी त एक टा  दृष्टान्त मात्र अछि  । एकर मतलब यी जे  जनजीवनमे समहित , जनताक हृदयके भितरे सं आएल यी संस्कृति अछि ।
प्राचीनकालमे पाषण मूर्तिसभ , प्राचिन मिथिला राज्यसभ के फैलिगर रुपसं देखल जाए त , बहुतो प्रकारसं यी संस्कृतिके आधार देखाबैत अछि ।  विशाल रुपसं देखल जाएत , बहुतो किसिमसं यी संस्कृतिके आधार झल्कबैत अछि ।
तेसर बात यी अछि, जे हम न्यायशास्त्रक विधार्थी , तर्कशास्त्रक बात मिथिलामे अछि ।     अहिंके सम्बन्ध बंगाल धरी अई । बंगालके विद्वान् आ अतुका विद्वानके सम्बन्ध अछि । ओ तर्कशास्त्रके जन्म भेल स्थान ।
तर्कमे यी भूमि, एकरा हम विशेष रुपसं लैत छियैक । व्यक्तिसभ हमरा कि कहलैन त अहां हिमालके कविता लिखलियै , मधेशके नै । हमर की आदत अछि,  हम हिमाल आ मधेशके अलग कऽक नहिं देखैत छिएक । अखन एतए हिमाल, पहाड, मधेश कहैत छैक यी बात हमरा मान्य नहिं अछि । देश एक छएक , लेक आ बेसी, लेक  सेहो तराइबासीके छैक , हिमाल सेहो छैक । हिमालवासीके सेहो ओ अमरकुञ्ज छैक, दुटा परस्पर नैभक जिनाइ कठिन छएक । व्यक्तिसभ कि कहलखिन जे  ‘गण्डकी कोसी कणार्ली मेची र महाकाली, लेक र बेसी ब्युझाउछन् लहर लाखौँ उचाली’ लिखु । गण्डकी कोसी कणार्लीे कि अहांक प्रदेशमे नहिं गेल अछि ? नहिं गेल अछि त हम नहिं गाएब , गेल अछि त गाएब । ह, हम मिथिला पर सेहो गित लिखने छि ।
याद अबैत अछि ?
....... ओत नई अबैया ।
    हमर किन्नरकिन्नरी गित संग्रहमे छैक । ओतैसं देखक छापब । आहिंके  पूर्णपाठ छापके हाएत त छापिलेब । हमर कहब हम मिथिलाके नहिं बिसरने छि । ओतके महत्व हमरा बुझल अछि । हम कोना मिथिला बिसैर सकैत छि ? हमरा ओ मुरली बजाक गोपिनिके भिडमे गाई घुरल अर्मकुण्डसं  सुगन्ध फैलल हम ओत रहिक ओ सुगन्ध फैलल देखैत छिएक । मिथिलाक बहुतो विशेषता अछि । जाहिंमे स हम अहां सभके तीनटा बतोलहुं अछि । आब अन्य बातसभ  वैदिक समय, उपनिषद्काल आब महाकाव्यक कालसं प्रसिद्ध स्थल अछि ।
नेपालके  साहित्य अपने समृद्ध अछि ओहिंमे मैथिली साहित्यक कतेक योगदान अछि ?
ः ओकर योगदान खास कऽक काठमाडौं भ्यालीमे देखल जाइत अछि । एतुका मल्ल राजासभ मैथली भाषाक संग सम्बन्ध जोडलैन । सिम्रनगढके राजाक संग एक प्रकारक सांस्कृतिक भाषा छल ओ छल मैथली । नेपालके मात्र बात नहिं करु । रविन्द्रनाथ ठाकुर अत्यन्त सुन्दर गित सब लिखने छैथ । ओहि बेरमे हुनक लेखाइमे मैथिल भाषक अत्यधिक प्रभाव परल छल । मैथिल कोकिल विद्यापतिके । एकटा  त भाषा प्रचारके लेल गित भेनाई आवश्यक अछि । गितसं जल्दिए जनमानसमे प्रभाव परैत छएक । बुद्धिजिविसभ मे काव्य सेहो होनाइ आवश्यक अछि । महाकाव्य, उपन्यास सब भेनाइ जरुरी अछि । तखन मात्र ओ फैलैत अछि । ओकर प्राचिनरुपसं आधुनिक रुपमे ओ जाइत अछि । किछुओ वर्ष हम गेल छलौ ।  मिथिलामे ओत एकगोट नाट्यकर्मी छलैथ नाम बिसैरि गेलौे , ह महेन्द्र मलंगिया जी ?  कहके मतलब नेपालमात्र नहिं भऽक बंगालमे सेहो एकर प्रभाव अछि । दोसर एक टा  बात कि अछि त मैथिल भाषाक प्रभाव विहारदिश बेसी अछि । नेपालमे सेहो अछि आ बंगालमे सेहो । ओतए बहुसंङ्ख्यक व्यक्ति मैथिल भाषा बुझैत छैथ ।
नेपालमे मल्ल्कालमे मैथलीके जे प्रभाव छलैक बिचमे आबिक कने टुटल जका नई लगैत छएक ?
एना होइत छैक । राज्य अपन भाषा, अपन साहित्यके प्रचारमे काज करवला भेल त अपन भाषासाहित्यक विकास होइत छैक नई त नई । हिन्दूस्तानमे अंग्रेजसभ शासन कएलकै । अंगे्रजसंग नजदिक भऽक जिअल राणासभक शासन आएल । ओहिं शासनकालमे स्वभाविके अहां मैथिल भाषाक मात्र नहिं अन्य भाषाक विकास सेहो नहिं भेलै । यद्यपि राणाके कालके सेहो हम एक टा बात निक मानैत छि । अंग्रेज सब लखनउ विद्रोह दबेबाक लेल जंगबहादुरके सेना पठाक खुसी भए कि मांगैत छि कहिक पुछलाबाद जंगबहादुर भाइभारदासभसंग सल्लाह कऽक पश्चिम तराई मगलैन ।
अखन राज्यपुनर्संरचनाके बात उठिरहल अछि । नेपाली भाषा जते मैथिली वा अन्य भाषाक स्थिति निक नहिं अछि । अहांक विचारमे कोन स्तरमे काम भेलासं मैथिली सहितक दबाओलगेल वा पछा पारल गेल भाषाक विकास भ सकैत अछि ?     
(अइमे हमर प्रष्ट विचार कि अछि त सम्पर्क भाषा नेपाली अछि । कोनो राष्ट्रमे राष्ट्रभाषा शिथिल भेल त सम्पर्क भाषा छिन्नभिन्न होइत अछि । सम्पर्कके रुपमे जे नेपाली भाषा प्राप्त भेल अछि । ओकर उन्नतीमे दख्खल देब नहिं चाहिं । ओहिं संगे मिलैत जुलैत अन्य भाषा मैथिली , अवधि ओकर विकास भेल त ओकर शब्द चिन्तन इत्यादि सं यी भाषा सेहो समृद्ध होइत जायत मुदा हम कि कहैत छि जे मैथिली अवधि सहितक अन्य भाषा बढिक नेपालीक स्थान लेबाक चाहिं, यि त कठिन बात अछि ।  कियाक त एक टा राष्ट्रमे दु तीनटा  राष्ट्रभाषा भेल त काज करबामे सेहो कठिनाई होएत । झमेला उत्पन्न हाएत । आब यी प्राचीन रुपमे साहित्य भेल भाषा एकर विकास उन्नती , जनस्तरमे आएल अछि ।  आब राष्द्र एकरा कोना आगा बढाबे तईमे स्पष्ट नीति भेनाई आवश्यक अछि । राज्यक एक टा कर्तव्य कि अछि त अपना भितर पैघ होइ वा माझिल भाषा ओकरा मर नहिं देनाइ कियाक त जनताक अपन संस्कृति , अपन रितीरिवाज व्यवहार ओहि भाषामे अंकित भेल रहैत अछि ।
नेपालीक परम्परा इतिहासक अप्पन महिमा अछि, अंग्रेजीके सेहो अछि , हिन्दी, मैथलीक सेहो अछि । हमसभ नेपाली , अंग्रेजी , हिन्दी , मैथिलीमे चारीटा भाषाक ऐतिहासिक मूल्यांकन करी त सबस बेसी समृद्ध के अछि ? एक , दु , तीन , चार कहि दियौन ?
ः नहिं ,  अंग्रेजी एक प्रकार सं विश्वक भाषा जेहन भेल । विज्ञान प्रविधि अन्तर्राष्ट्रिय सम्बन्ध, भूमण्डलीय करणसनक बातसं अंग्रेजी त बाह्य अछि । एहन बेरमे अंग्रेजी नहिं चाहि कहिक अपन सभक विकास नहिं होएत । यी एक प्रकारक अन्तर्राष्ट्रिय भाषा भचुकल अछि । आब आएल हिन्दीक बात हिन्दीके हिन्दूस्तानक राष्ट्रभाषाके सम्मानके रुपमे अपना  सभके देखबाक चाहिं । अपना सभमे लएबाक प्रयास कएलगेल हमरासभक  तराईकाभाषासभ ध्वस्त भ जाएत । जखन हिन्दीक नारा लगाओल जाएत त अपन सनेपाली भाषा ध्वस्त नहिं हाएत । मैथली, भोजपुरी, अवधि यि तीन भाषा मरिजाएत । यि भाषाके खा जाएत । नेपालीके कहिं त हिन्दी नहिं खा सकैत अछि । हमसभ नेपालीक जगहमे हिन्दी लाएब त हिन्दूस्तान पहिले अइ बातके नहिं मानत । ओ पूरे हिन्दुस्तान भित्र त लागू कर नहि सकल अछि । अपन देशमे त लागु नहिं कर सकल अछि । दोसर देशमे कोना हेतैक । यदि हिन्दी भाषा लाओल जाएत त पहिले तराईके खा जाएत । ओकरा बाद नेपालीके खाएत । यी देश नहिंयो रहि सकैत अछि । ताहिं कारणे हमसभ तराईके भाषा आ अन्य भाषाके संरक्षण कएनाई आवश्यक अछि ।
 मिथिला साहित्य संस्कृतिसंग सम्बन्धित अहांक कोनो संस्मरण अछि ?
ः विद्यापतिक पदावलीके संकलन भेल एक टा किताब पढने छलियै । ओ जयदेवक गितसंग मिलैत जुलैत छलैक । ओहि समयमे हमर मनमे ओ भाषा निक साहित्य भेल भाषा अछि कहिक विम्ब ठाड भेल छल ।  हम  पच्चिस तीस वर्षक उमेरमे पढ्ने हेबै । बादमे जनकपुर जाइत अबैत आ  ओतुका व्यक्तिसभसंग सम्पर्क भेलाकबाद बुझली जे यी मैथली अई ।

धन्यवाद अछि अपनेके 
ः किछु अछि त कहु हम त नेपालीके लेखक छि । साहित्यिक रुपमे हम मैथिलीके प्रसंसक व्यक्ति छि । 
                                                                                










1 comment:

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